पटना हाईकोर्ट ने आरपीसीएयू के दो अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई रद्द की

पटना हाईकोर्ट ने आरपीसीएयू के दो अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई रद्द की

चार्ज मेमो जारी करने से पहले बोर्ड ऑफ मैनेजमेंट की मंजूरी जरूरी, नियमों का पालन नहीं होने पर कोर्ट ने जांच रिपोर्ट भी की निरस्त

जे टी न्यूज, पटना: पटना हाईकोर्ट ने डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय (आरपीसीएयू), पूसा के दो अधिकारियों के खिलाफ चल रही विभागीय कार्रवाई को रद्द कर दिया है। न्यायमूर्ति हरीश कुमार की अदालत ने कहा कि विभागीय कार्रवाई शुरू करने की मंजूरी और आरोप-पत्र (चार्ज मेमो) जारी करने की मंजूरी अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। चार्ज मेमो जारी करने से पहले संबंधित अनुशासनिक प्राधिकारी से आवश्यक मंजूरी लेना अनिवार्य है।

मामला आरपीसीएयू में प्रतिनियुक्ति पर डिप्टी रजिस्ट्रार के पद पर कार्यरत महेश हुड्डा और डॉ. रमेश कुमार पाठक से संबंधित है। दोनों अधिकारियों ने अलग-अलग सिविल रिट याचिकाएं दायर कर उनके खिलाफ शुरू की गई विभागीय कार्रवाई को चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने दोनों याचिकाओं को स्वीकार करते हुए विभागीय कार्रवाई की आगे की कार्यवाही, संबंधित चार्ज मेमो और 2 फरवरी 2026 को प्रस्तुत जांच रिपोर्ट को निरस्त कर दिया।

2023 में शुरू हुई थी विभागीय कार्रवाई

कोर्ट के आदेश के मुताबिक, आरपीसीएयू में प्रशासनिक और वित्तीय अनियमितताओं से संबंधित शिकायतों के बाद कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (DARE) के माध्यम से जांच कराई गई थी। इसके बाद विश्वविद्यालय में तीन सदस्यीय आंतरिक समिति गठित की गई।

समिति की रिपोर्ट को 6 दिसंबर 2023 को बोर्ड ऑफ मैनेजमेंट की 21वीं बैठक में एजेंडा संख्या 21.8 के तहत रखा गया। बोर्ड ने दोनों अधिकारियों के खिलाफ केंद्रीय सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम, 1965 के नियम 14 के तहत विभागीय कार्रवाई शुरू करने का निर्णय लिया था।

बोर्ड ने कुलपति को चार्जशीट जारी करने, जांच अधिकारी और प्रस्तुतिकरण अधिकारी नियुक्त करने तथा जांच से संबंधित रोजमर्रा के निर्णय लेने के लिए अधिकृत किया था।

इसके बाद मुख्य सतर्कता अधिकारी ने 2 अप्रैल 2025 को दोनों अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई का मेमोरेंडम जारी किया। जांच पूरी होने के बाद जांच अधिकारी ने 2 फरवरी 2026 को अपनी रिपोर्ट सौंपी, जिसमें आरोपों को स्थापित माना गया था।

चार्ज मेमो से पहले मंजूरी को कोर्ट ने माना अनिवार्य

मामले में मुख्य कानूनी प्रश्न यह था कि क्या विभागीय कार्रवाई शुरू करने के लिए बोर्ड ऑफ मैनेजमेंट की दी गई मंजूरी ही चार्ज मेमो जारी करने के लिए पर्याप्त थी या चार्ज मेमो जारी करने से पहले बोर्ड की अलग मंजूरी आवश्यक थी।

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Union of India vs. B.V. Gopinath, State of Tamil Nadu vs. Pramod Kumar और Sunny Abraham vs. Union of India समेत संबंधित फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि विभागीय कार्रवाई शुरू करने की मंजूरी और चार्ज मेमो जारी करने की मंजूरी अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं।

अदालत ने रिकॉर्ड और विश्वविद्यालय की ओर से दाखिल हलफनामे का उल्लेख करते हुए कहा कि चार्ज मेमो जारी किए जाने के समय अनुशासनिक प्राधिकारी से आवश्यक मंजूरी नहीं ली गई थी। इस कारण CCS (CCA) Rules, 1965 के Rule 14(3)(b) में निर्धारित अनिवार्य प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ।

नए सिरे से कार्रवाई की राह खुली

हाईकोर्ट ने कहा कि आवश्यक मंजूरी की कमी के कारण दोनों अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई में की गई आगे की कार्यवाहियां, चार्ज मेमो और 2 फरवरी 2026 की जांच रिपोर्ट टिकाऊ नहीं हैं। इसलिए इन्हें निरस्त किया जाता है। हालांकि, अदालत ने अनुशासनिक प्राधिकारी को कानून के अनुसार आवश्यक प्रक्रिया पूरी करने के बाद दोनों अधिकारियों के खिलाफ नया चार्ज मेमो जारी करने की स्वतंत्रता दी है।

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