बिहार के शिक्षक और स्नातक मतदाताओं ने ‘एन स्क्वायर’ की राजनीति को दिखाया आईना
बिहार के शिक्षक और स्नातक मतदाताओं ने ‘एन स्क्वायर’ की राजनीति को दिखाया आईना
जे टी न्यूज,

पटना: बिहार के सम्मानित शिक्षक और स्नातक मतदाताओं ने अपने मताधिकार के जरिए सत्ता के अहंकार को चुनौती देने का संदेश दिया है। चुनावी वादों और अंतिम समय में की गई घोषणाओं से मतदाताओं को प्रभावित करने की कोशिश कितनी सफल रही, इसका फैसला चुनाव परिणाम करेंगे। लेकिन शिक्षकों की लंबित समस्याओं ने सत्ता पक्ष के सामने गंभीर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं।
एक तरफ मंत्री-विधायकों को समय पर वेतन और तरह-तरह के भत्ते, दूसरी तरफ शिक्षकों को वर्षों का इंतजार! आरोप है कि बिहार के 225 संबद्ध महाविद्यालयों के शिक्षकों की अनुदान राशि वर्ष 2017 से अब तक लंबित है। आखिर उच्च शिक्षा की रीढ़ माने जाने वाले शिक्षकों को अपने ही वेतन और अनुदान के लिए इतनी लंबी प्रतीक्षा क्यों करनी पड़ रही है?
चुनाव की घोषणा होते ही यदि लंबित भुगतान और शिक्षकों की समस्याएं याद आने लगें, तो सवाल उठना लाजिमी है—क्या शिक्षकों के अधिकार केवल चुनाव के समय याद आते हैं? शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी की घोषणाओं और आश्वासनों की असली परीक्षा अब उनके ठोस क्रियान्वयन से होगी, न कि केवल चुनावी मंचों से।
मतदान समाप्त होने के बाद राजनीतिक दल अपनी-अपनी जीत के दावे कर सकते हैं, लेकिन शिक्षक मतदाताओं की नाराजगी को हल्के में लेना बड़ी भूल होगी। भारतीय जनता पार्टी और एनडीए की चुनावी रणनीति कितनी कारगर रही, यह परिणाम बताएंगे; मगर वर्षों से लंबित अनुदान का सवाल सत्ता से जवाब जरूर मांगता है।

और जहां तक ‘विश्वगुरु’ तथा ‘विकासपुत्र’ जैसे नारों का सवाल है, तो बिहार की जनता अब नारों से आगे बढ़कर ठोस परिणाम देखना चाहती है। यदि विकास की राजनीति का दावा करने वाली सरकार में शिक्षक ही अपने भुगतान के लिए वर्षों तक संघर्ष करें, तो विकास के दावों की समीक्षा होना स्वाभाविक है।
बिहार का विकास भाषणों से नहीं, शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने और शिक्षकों को उनका हक देने से होगा। शिक्षक केवल मतदाता नहीं, बल्कि समाज और भविष्य के निर्माता हैं। उनकी उपेक्षा करके किसी भी राजनीतिक दल के लिए जनविश्वास की परीक्षा में सफल होना आसान नहीं है।
अब फैसला जनता की अदालत में है—नारे भारी पड़ेंगे या शिक्षकों के सवाल?


